Class 9 Biology Chapter 2 Notes in Hindi | ऊतक (Tissues) Full Chapter Best Notes For Class 9th in Hindi

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इस पोस्ट में हम आपके लिए लाये हैं Class 9 Biology Chapter 2 Notes in Hindi | इस chapter का नामऊतक (Tissues)” है | इस पोस्ट में हमने class 9 Biology chapter 2 से एक Short Notes बनाया है , जो आपके लिए बहुत ही उपयोगी है |  इस पोस्ट में ऊतक (Tissues)” से लगभग सभी पॉइंट को एक एक करके परिभाषित किया गया है जिसे पढ़ कर कम से कम समय में अपनी तयारी कर सकते है और अच्छे नम्बर से परीक्षा में उत्तीर्ण हो सकते हैं | आप class 9 Biology chapter 2 pdf notes भी Download कर सकते हैं | Class 9 Biology Chapter 2 Notes in Hindi .

Table of Contents

ऊतक(Tissues) किसे कहते है ? 

उत्पत्ति और बनावट के आधार पर समान कोशिकाओं के समूह को ऊतक कहते हैं

 यह मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं

  1. पादप ऊतक 
  2. जंतु ऊतक 

1. पादप ऊतक किसे कहते है ? 

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Plant Tissues

 पौधों में उपस्थित ऊतकों को पादप ऊतक कहते हैं | यह मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं-

  1.  विभज्योतक 
  2. स्थायी ऊतक 

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1. विभज्योतक किसे कहते हैं ? 

 जो पादप ऊतक पौधों के वर्धि भाग में पाया जाता है तथा जिसमें वृद्धि एवं विकास होता है, विभज्योतक कहलाता है

 विभज्योतक का कार्य – इस ऊतक की कोशिकाएं लगातार विभाजित होते हुए पौधों के लंबाई और मोटाई में वृद्धि लाता है

 विभज्योतक के प्रकार

विभज्योतक को दो आधार पर वर्गीकृत किया जाता है-

  1.  उत्पत्ति के आधार पर
  2.  स्थिति के आधार पर

विटामिन की खोज ,प्रकार,स्रोत एंव कमी से होने वाले रोग

1. उत्पत्ति के आधार पर

 इस आधार पर विभज्योतक दो प्रकार के होते हैं-

 a. प्राथमिक विभज्योतक

 b. द्वितीयक विभज्योतक

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a.  प्राथमिक विभज्योतक

 जो विभज्योतक पौधों के जनन अंगों जैसे- फूल, में पाया जाता है, प्राथमिक विभज्योतक कहलाता है| 

 b. द्वितीयक विभज्योतक

 जो विभज्योतक पौधों के तना, जड़ इत्यादि में पाया जाता है, द्वितीय विभज्योतक कहलाता है| 

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2. स्थिति के आधार पर 

इस आधार पर विभज्योतक तीन प्रकार के होते हैं-

 a. शीर्षस्थ विभज्योतक

 b. पार्श्व विभज्योतक

 c. अंतर्वेशी विभज्योतक

 a. शीर्षस्थ विभज्योतक

 जो विभज्योतक पौधों के शीर्ष भाग में जैसे- पुंगी और जड़ में पाया जाता है, शीर्षस्थ विभज्योतक कहलाता है|  इस विश्व युद्ध के कारण पौधों के लंबाई में वृद्धि होती है| 

  b. पार्श्व विभज्योतक

 यह विभज्योतक पौधों के तना एंव टहनियों में पाया जाता है| इसके कारण पौधों के मोटाई में वृद्धि होती है| 

 c. अंतर्वेशी विभज्योतक

 यह विभज्योतक पौधों की पत्तियों के वृन्तों के पास एवं पर्वो में पाया जाता है| इसके कारण नये टहनियों का निर्माण प्रारंभ होता है| 

2. स्थाई ऊतक किसे कहते हैं ?

 जो पादप उत्तक पौधों के तनों में पाया जाता है तथा जिस में वृद्धि और विकास नहीं होता है, स्थाई ऊतक कहलाता है |

 उत्पत्ति और विकास के आधार पर स्थाई ऊतक के प्रकार

 इस आधार पर स्थाई ऊतक दो प्रकार के होते हैं

  1.  प्राथमिक स्थायी ऊतक
  2.  द्वितीयक स्थायी ऊतक
  1. प्राथमिक स्थायी ऊतक 

 जिस स्थायी ऊतक का निर्माण शीर्षस्थ और अंतर्वेशी से होता है,उसे प्राथमिक स्थायी ऊतक कहते हैं

  1. द्वितीय का स्थायी ऊतक

 जिस स्थायी ऊतक का निर्माण पार्श्व विभज्योतक अथवा कैंडियम ऊतक से होता है, द्वितीयक स्थायी ऊतक कहलाता है

 अन्य आधार पर स्थायी ऊतक तीन प्रकार के होते हैं

  1. सरल स्थायी ऊतक
  2. जटिल स्थायी ऊतक
  3. विशिष्ट स्थायी ऊतक

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1. सरल स्थायी ऊतक किसे कहते हैं ? 

 इस स्थायी ऊतक का निर्माण एक समान स्थायी कोशिकाओं जिनकी कोशिका भित्ति अनिश्चित मोटाई की होती है सरल स्थायी ऊतक कहलाता है| 

यह तीन प्रकार के होते हैं-

  1.  मृदूतक 
  2.  स्थूलकोण ऊतक 
  3.  दृढ़ ऊतक 

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  1. मृदूतक  किसे कहते हैं ? 

 पतली कोशिका भित्ति वाले कोशिकाओं के समूह से बना वह स्थायी ऊतक जो पौधों के कोमल भागों में स्थित रहता है,मृदूतक कहलाता है | यह मुख्यतः तना, जड़, पत्ती, फल तथा बीज के एंडोस्पर्म में पाया जाता है | जब कभी मृदूतक की कोशिकाएं हरित लवक में पाया जाता है, तो उसे क्लोरोकाईमा कहते हैं |  तथा जब यह जलीय पौधों की कोशिकाओं में वायु कोष्ठ  में पाया जाता है तो उसे एरेन्काइमा कहते हैं | 

  1. स्थूलकोण ऊतक  किसे कहते हैं ? 

 जब मृदूतक के कोशिकाओं के शीर्ष भाग पर सेल्यूलोज जमा हो जाता है, तो यह रचना स्थूलकोण ऊतक कहलाता है | यह ऊतक पतियों के वृन्तों एवं तनों के बाह्य त्वचा के नीचे पाया जाता है |  यह उत्तक पौधों को लचीलापन एवं यांत्रिक मजबूती प्रदान करता है| 

  1. दृढ़ ऊतक  किसे कहते हैं ? 

 लंबी-लंबी कोशिकाओं से बना वह ऊतक जिसके किनारे का भाग पतला होता है, दृढ़ ऊतक कहलाता है | यह ऊतक तना को कठोर, मजबूती एवं लचीलापन प्रदान करता है|  

यह दो प्रकार के होते हैं-

  1.  दृढ़ ऊतक तंतु
  2.  सलेरिड्स या स्टोन सेल्स

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  1.  दृढ़ ऊतक तंतु

  यह दृढ़ उत्तक एक बीज पत्री पौधों के तनों के बाह्य त्वचा के नीचे रेशा के रूप में पाया जाता है, जो तना को टूटने से बचाता है|  जैसे- जूट, पटसन, सनई, फ्लेक्स इत्यादि

  1. सलेरिड्स या स्टोन सेल्स 

 वैसा दृढ़ ऊतक जो अनियमित आकार के कोशिकाओं से बना होता है एंव संबंधित अंगों को कठोरता प्रदान करता है, सलेरिड्स या स्टोन सेल्स कहलाता है|  जैसे- मूंगफली का छिलका, आम की गुठली, काबली बादाम का छिलका इत्यादि| 

   2. जटिल स्थायी ऊतक  किसे कहते हैं ? 

 जो स्थायी ऊतक अनेक प्रकार के जीवित एवं मृत कोशिकाओं के मिलने से होता है जटिल स्थायी ऊतक कहलाता है|  पौधों में पाया जाने वाला संवहन उत्तक जटिल स्थायी ऊतक का एक उदाहरण है | 

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संवहन ऊतक के प्रकार

 संवहन ऊतक मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं

  1. जाइलम
  2. फ्लोएम 
1. जाइलम  किसे कहते हैं ? 

वैसी संवहन उत्तक जो पौधों के जड़ों से पत्तियों तक फैला रहता है जाइलम कहलाता है यह उत्तक पौधों के प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक कच्ची सामग्री जैसे जल एवं खनिज लवण को नीचे से ऊपर की दिशा में ले जाता है जाइलम उत्तक के चार प्रकार होते हैं 

  1.  ट्रैकिडस :- यह मृत कोशिकाओं की बानी नलिकाकार लम्बी  रचना है जो जल को ऊपर की ओर प्रवाहित करने में सहायक होता है | 
  2. जाइलम नलिका :- यह ट्रैकिडस से छोटा किन्तु उससे मोटा बेलनाकार रचना है , जिसका दोनों सिरा खुला रहता है | 
  3. जाइलम तंतु :- यह दृढ़ ऊतक की बानी तंतुवत रचना है जो जाइलम वाहिनियों को सहारा प्रदान करता है | 
  4. जाइलम मृदूतक :- जीवित जीव द्रव्य एवं पतली कोशिका भित्ति से बानी यह मृदूतक जल के संवहन एवं उपापचय के दौरान बने भोज्य पदार्थ के संग्रह का कार्य करता है | 

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     2.    फ्लोएम  किसे कहते हैं ? 

वैसा संवहन ऊतक जो पौधों में तैयार भोजन एवं अन्य कार्बनिक तथा अकार्बनिक पदार्थों को परिवहन करता है , फ्लोएम ऊतक कहलाता है | इसके भी मुख्यतः चार भाग होते हैं –

  1. चालनी नलिका :- यह एक बेलनाकार नलिका है जो एक – दूसरे से ऊपर – नीचे की दिशा में जुड़ी रहती है | प्रत्येक चालनी नलिका में छिद्रनुमा प्लेट होता है जिसे चालनी पट कहते है | यह भोजन को एक कोशिका से दूसरे कोशिका में ले जाता है | 
  2. सखी कोशिका :- पतली कोशिका भित्ति वाली लंबी मृदूतक कोशिकाओं को सखी कोशिका कहते हैं यह चालनी नलिका से भोजन के परिवहन में सहायता करता है| 
  3. फ्लोएम मृदूतक : – यह पतली कोशिका भित्ति वाले मृदूतक कोशिकाओं से बना होता है जो चालनी नलिका से जुड़े रहकर भोजन के परिवहन में सहायता करता है| 
  4. फ्लोएम तंतु :- यह दृढ़ ऊतक तंतुओं के मिलने से बनता है जो फ्लोएम उत्तक को मजबूती एवं सहायता प्रदान करता है| 

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3.  विशिष्ठ स्थायी ऊतक  किसे कहते हैं ? 

कुछ विशिष्ट पौधों में ऐसे उत्तक पाए जाते हैं जो विशेष प्रकार के रासायनिक पदार्थों का स्राव करता है, विशिष्ट स्थाई उत्तक कहलाता है | यह  दो प्रकार के होते हैं-

i. लेटीसीफेरस :- रबड़ जैसे पौधों में उजले रंग का गाढ़ा द्रव्य पदार्थ का उत्सर्जन होता है लेटेक्स कहलाता है तथा इसको स्रावित करने वाले उत्तक लेटीसीफेरस कहलाता है| 

ii. ग्रंथिल ऊतक :- पौधों के वे ऊतक , जो तेल जैसे पौधों का स्राव करते हैं, ग्रंथिल ऊतक कहलाता है| 

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2. जंतु ऊतक  किसे कहते हैं ? 

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Animal Tissues

जंतुओं में एक समान कोशिकाओं के समूह से बने ऊतक  को जंतु ऊतक कहते हैं |  जंतु उत्तक मुख्यतः चार प्रकार के होते हैं – 

1. एपिथीलियम ऊतक किसे कहते हैं ? 

जो जंतु उत्तक शरीर के बाह्य अथवा आंतरिक अंग के लिए रक्षात्मक आवरण का निर्माण करता है, एपिथीलियम ऊतक कहलाता है यह आहारनाल, फेफड़ा, ह्रदय, मुख्य गुहा के सतह में पाया जाता है| 

एपिथीलियम ऊतक के कार्य
  • इस  ऊतक की सतहें जीवाणुओं, रासायनिक पदार्थों की विकिरणों एवं अन्य हानिकारक पदार्थों से आंतरिक अंगों की रक्षा करता है | 
  •  इस उत्तक में उपस्थित ग्रंथियां एक विशेष प्रकार के पदार्थों का स्राव करता है, जैसे – पाचक रस, दूध इत्यादि | 
  •  उत्सर्जन नलिकाओं में पाई जाने वाली यह उत्तक उत्सर्जन में सहायता करता है | 
  •  इसकी कोशिकाएं तंत्रकीय आवेगो को ग्रहण करता है | 
  •  जननांगों में उपस्थित यह ऊतक युग्मक निर्माण में सहायता करता है | 

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 एपिथीलियम ऊतक के प्रकार

 एपिथीलियम ऊतक मुख्यतः सात प्रकार के होते हैं –

 A. शल्की एपिथीलियम  किसे कहते हैं ? 

 यह उत्तक चपटी प्लेट जैसी षष्ट भुजकर कोशिकाओं से बनी होती है|  यह ऊतक  फेफड़ा के आंतरिक दीवारें, वृक्क नलिकाओं के वूमेन कैप्सूल, आंतरिक कान की झिल्ली, रक्त नलिकाओं के दीवारें तथा मुख्य गुहा में पाया जाता है | इसका कार्य आंतरिक अंगों को सुरक्षा प्रदान करना तथा विसरण क्रिया में सहायता करना है | 

B. घनाकार एपिथीलियम  किसे कहते हैं ? 

यह ऊतक घनाकार कोशिकाओं से बनता है |  यह मुख्य रूप से गुर्दा और लार ग्रंथियों में पाया जाता है | इस ऊतक का मुख्य कार्य पदार्थों का स्राव करना, अवशोषण करना तथा संबंधित अंगों को सहारा प्रदान करना है | 

C. स्तम्भी एपीथिलियम  किसे कहते हैं ? 

 यह ऊतक खम्बे जैसी कोशिकाओं से बनता है |  छोटी आंत की आंतरिक दीवार पर यह उत्तक पाए जाते हैं |  जिनको माइक्रो भिलाई कहते हैं |  इसके अतिरिक्त यह ऊतक गला, आमाशय, आंत  तथा मादाओं के अण्डवाहिनीओं में पाया जाता है |

D. पक्षमल एपीथिलियम  किसे कहते हैं ? 

यह ऊतक घनाकार एवं स्तंभकार के रूपांतरण से बनता है |  यह नाक की आंतरिक दीवारें, ट्रेकिया अंडवाहिनी तथा मेंढक के मुख्य गुहा में पाया जाता है | 

E. ग्रंथिल एपिथीलियम  किसे कहते हैं ? 

यह एपिथीलियम ऊतक स्तंभाकार एपिथीलियम का रूपांतरित रूप है, जो कुछ विशिष्ट रासायनिक पदार्थों को उत्सर्जित करता है | सफेद ग्रंथि, सिबेसियस ग्रंथि एवं लार ग्रंथि, ग्रंथिल एपिथीलियम का प्रमुख उदाहरण है | 

F. संवेदी एपिथीलियम  किसे कहते हैं ? 

यह एपिथीलियम ऊतक भी स्तंभाकार एपिथीलियम का ही रूपांतरित रूप है, जो संवेदी कोशिकाओं में पाया जाता है |  जीभ के स्वाद नलिका, कान की आंतरिक झिल्ली एवं नाक की ऑलफैक्ट्रीलोबस में यह एपिथीलियम पाया जाता है | 

G. स्तरित एपीथिलियम किसे कहते हैं ? 

यह उत्तक कोशिकाओं के परत दर परत मिलने से बनता है, जो सजीव शरीर की त्वचा में स्थित रहता है | 

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2. संयोजी ऊतक  किसे कहते हैं ? 

वैसा जंतु उत्तक जो जीव शरीर के अंगों को जोड़ने का कार्य करता है संयोजी ऊतक कहलाता है | 

संयोजी उत्तक के कार्य
  •  यह अंगों और शारीरिक संरचनाओं को जोड़ता है | 
  •  यह अंगों और अन्य ऊतकों के चारों ओर रक्षात्मक आवरण का  निर्माण करता है | 
  •  यह उत्तक सूक्ष्मजीव के संक्रमण से शरीर की रक्षा करता है | 
  •  यह घायल और अनावश्यक ऊतकों को हटाता है | 
  •  यह जीव शरीर में कंकाल की रचना करता है | 
 संयोजी उत्तक के प्रकार

 संयोजी उत्तक मुख्यतः चार प्रकार के होते हैं

 A. वास्तविक संयोजी उत्तक

 इस संयोजी उत्तक को 5 भागों में बांटा गया है, जिसका नाम एवं कार्य इस प्रकार है-

 a. अंतरालीय संयोजी उत्तक  किसे कहते हैं ? 

 यह वास्तविक संयोजी उत्तक शरीर के अधिकांश भागों में पाया जाता है, इसमें चार प्रकार की कोशिकाएं और दो प्रकार के तंतु पाए जाते हैं, जैसे- फाइब्रोब्लास्ट कोशिकाएं, मैक्रोफेज मास्ट कोशिकाएं,लिम्फ कोशिकाएं, कोलेजन तंतु और इलास्टिन | 

 b. पीत लचीले उत्तक  किसे कहते हैं ? 

 यह वास्तविक संयोजी उत्तक पीले एवं लचीले तंतु से बना होता है |  यह धमनियों की दीवारें, ब्रांकिओल एवं कंकाल के पास पाया जाता है |  इसका मुख्य कार्य त्वचा को उसके नीचे स्थित मांसपेशियों से जोड़ना है | 

c. श्वेत तंतुवत ऊतक  किसे कहते हैं ? 

 यह वास्तविक संयोजी उत्तक कोलाजन तंतुओं के परस्पर मिलने से बनता है | इसका मुख्य कार्य मांसपेशियों को हड्डियों से मजबूती से जोड़ना है | इसके अतिरिक्त यह ऊतक रीढ़रज्जु एवं मस्तिष्क के ड्यूरामेटर में पाया जाता है | 

d. एडिपोज या वसीय ऊतक  किसे कहते हैं ? 

 यह संयोजी उत्तक शरीर के गहराई वाले हिस्से, अस्थि मज्जा तथा आंतरिक अंगों में पाया जाता है |  इस में उपस्थित वसा का कण सजीव  को ठंडक से बचाने में सहायता करता है | 

e. जलावत ऊतक  किसे कहते हैं ? 

यह वास्तविक संयोजी ऊतक तारों के जैसे आकार वाली कोशिकाओं के मिलने से बनता है | जिसके कोने पर जीवद्रव्य के प्रवर्ध निकलकर जाल का निर्माण करते है | ये ऊतक प्लीहा, अस्थि मज्जा तथा यकृत में पाया जाता है | 

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B. कंकाल ऊतक  किसे कहते हैं ? 

  वैसा संयोजी ऊतक जो जीव शरीर को एक निश्चित आकृति प्रदान करता है, कंकाल ऊतक कहलाता है | 

कंकाल ऊतक के कार्य  
  • यह शरीर को एक निश्चित आकार प्रदान करता है | 
  • यह शरीर के कोमल अंगों जैसे – मस्तिष्क, हृदय एवं फेफड़ा आदि को सुरक्षा प्रदान करता है | 
  • यह शारीरिक गति में सहायता करता है | 
कंकाल ऊतक के प्रकार 

यह ऊतक दो प्रकार के होते है – 1. अस्थि  2. उपास्थि 

अस्थि  किसे कहते हैं ? 

यह अपेक्षाकृत अधिक कठोर और मजबूत होता है इसके कठोरता का मुख्य कारण इस में उपस्थित कैल्शियम और मैग्नीशियम के लवण है|  यह अपारगम्य होता है तथा इसके अंदर मैट्रिक्स के रूप में अकार्बनिक लवण पाए जाते हैं |  इसमें ऑस्टियोसाइट कोशिकाएं एकल अवस्था में पाया जाता है | इसमें कैनली कुली  नामक पतली पतली नलिकाए उपस्थित रहती है तथा इस हड्डियों के आंतरिक गुहा में अस्थि मज्जा भरा होता है, जो वसा और रक्त कोशिकाओं से बना होता है  | 

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उपास्थि  किसे कहते हैं ? 

यह अस्थि के अपेक्षाकृत अधिक मुलायम और लचीला होता है, यह हड्डियों के जोड़ों, नाक, कान तथा ट्रेकिया में पाया जाता है | इसके मैट्रिक्स में एक विशेष प्रकार का प्रोटीन भरा रहता है जिसे कॉन्ड्रिन कहते हैं | यह पोषक पदार्थों एवं ऑक्सीजन के लिए पारगम्य होता है | इसमें उपस्थित कंडरियोसाइट्स कोशिकाएं समूह में पाई जाती है | इस कंकाल उत्तक में रक्त की आपूर्ति नहीं होती है | | 

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C. स्नायु और कण्डरा  किसे कहते हैं ? 

यह एक तंतुवत संयोजी उत्तक है, जो लचीला और मजबूत होता है |  स्नायु एक हड्डी को दूसरा हड्डी से जोड़ता है, जबकि कण्डरा मांसपेशियों को हड्डियों से जोड़ने का कार्य करता है | 

 D. तरल संयोजी उत्तक  किसे कहते हैं ? 

 इस उत्तक को परिवहन उत्तक भी कहते हैं क्योंकि यह ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड, पोषक पदार्थ, विटामिन तथा हार्मोन को शरीर के एक भाग से दूसरे भाग तक ले जाता है रक्त और लिम्फ कोशिकाएं सम्मिलित रूप से तरल संयोजी उत्तक का निर्माण करता है | 

 रक्त क्या है ? 

 वैसा तरल संयोजी उत्तक जो प्लाज्मा और रक्त कोशिकाओं के मिलने से बनता है रक्त कहलाता है | इसमें तीन प्रकार की कोशिकाएं पाई जाती है-

 लाल रक्त कोशिका  

 यह पीले रंग की रक्त कोशिकाएं हैं जो हीमोग्लोबिन नामक रंजक के कारण लाल रंग का होता है | इसका मुख्य कार्य पोषक पदार्थ, विटामिन, हार्मोन तथा कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन करना है | इसका दूसरा नाम एरिथ्रोसाइट भी है | इसे संक्षिप्त में RBC भी कहते हैं | 

 श्वेत रक्त कोशिका

 यह तरल संयोजी उत्तक रंगहीन एवं अनियमित आकार के कोशिकाओं के मिलने से बनता है | इसका मुख्य कार्य जीवाणुओं और अन्य संक्रामक रोगों से शरीर को सुरक्षा प्रदान करना है | इसका दूसरा नाम ल्यूकोसाइट भी है | इसे संक्षिप्त में WBC भी कहते हैं | 

 बिम्बाणु 

 यह तरल संयोजी उत्तक तुर्क रूप में पाया जाता है इसकी संख्या रक्त में अत्यंत कम होती है इसका मुख्य कारण रक्त को थक्का जमने में सहायता करना है | रक्त के इस घटक की मात्रा कम होने की स्थिति में रक्त का प्रभाव बंद नहीं होता है |  इसका दूसरा नाम थ्रोम्बोसाइट है | 

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 लसीका या लिम्फ  किसे कहते हैं ? 

 यह तरल संयोजी उत्तक रंगहीन होता है तथा इसमें प्रोटीन, ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, लिंफोसाइट और फ़ैगोसाइट कोशिकाएं उपस्थित रहती है |  इसका प्रभाव हमारे शरीर में एक विशेष तंत्र के द्वारा होता है, जिसे लसिका तंत्र कहते हैं

 इसका कार्य निम्न मत है

 यह पदार्थों के परिवहन में सहायक होता है | 

 यह वसा के परिवहन में सहायता करता है | 

 यह संक्रामक रोग वाह को से हमारे शरीर को सुरक्षा प्रदान करता है | 

3.पेशीय ऊतक  किसे कहते हैं ? 

यह जंतु ऊतक संकुचनशील रेशों के मिलने से बना होता है, जिसमें मैट्रिक्स का अभाव होता है, पेशीय ऊतक कहलाता है | इस उत्तक के रेशे में उपस्थित संकुचनशील जीव द्रव्य होता है, इसे सार्कोप्लाज्म कहते हैं, जो एक झिल्ली से घिरा होता है, इस जिले को सरकोलिमा  कहते हैं | 

 कार्य के आधार पर पेशीय उत्तक दो प्रकार के होते हैं

 ऐच्छिक पेशी :- जिस पेशीय उत्तक के कार्य पर मस्तिष्क का नियंत्रण होता है ऐच्छिक पेशी कहलाता है | जैसे- हाथ और पैर की पेशी | 

 अनैच्छिक पेशी :-  जिस पेशीय ऊतकों पर मस्तिष्क का नियंत्रण नहीं होता है, अनैच्छिक पेशी कहलाता है | जैसे- हृदय की पेशी, फेफड़ा की पेशी | 

संरचना के आधार पर पेशीय ऊतक तीन प्रकार के होते हैं –

 कंकाल पेशी या  रेखित पेशी :- यह पेशी बंडलों के रूप में लंबी और बेलनाकार कोशिकाओं की बनी होती है | इस ऊतक में सरकोलिमा पाई जाती है |  इसके कोशिकाओं में अनेक केन्द्रक पाए जाते हैं जो परिधि की ओर होता है यह मुख्यतः  ऐच्छिक पेशी है जो हाथ और पैर में पाई जाती है |  यह पेशी शीघ्र ही थक जाती है | 

 आरेखित पेशी :-  यह पेशीय ऊतक तन्तुवत कोशिकाओं से बनती है जो आकार में लंबी होती है |  इस उत्तक में सरकोलिमा उपस्थित नहीं रहता है | इस  ऊतक की कोशिकाओं में एक केन्द्रक पाए जाते हैं जो उसके मध्य में होता है यह मुख्य रूप से अनैच्छिक पेशी है जो कभी थकती नहीं है | यह पेशीय ऊतक पाचन नली की भित्तियों, रक्त वाहिनियों एवं  मूत्राशय में पाया जाता है | 

 हृदय की पेशी :-  यह पेशीय ऊतक रेखित होते हुए भी अनैच्छिक होता है जो लगातार क्रियाशील होते हुए भी थकता नहीं है |  इस उत्तक में सरकोलिमा भी पाया जाता है | 

 4. तंत्रिका उत्तक  किसे कहते हैं ? 

 इस ऊतक का निर्माण तंत्रिका कोशिकाओं से होता है, जिसके निम्नलिखित भाग होते हैं-

 साइटन :-  यह एक तारे जैसी रचना है जिसके बीच में एक बड़ा और स्पष्ट केन्द्रक होता है | 

 डेंड्रॉन :- साइटन के बाहरी भाग में अनेक भुजाएं निकली होती है जिसे  डेंड्रॉन कहते हैं | 

 डेन्ड्राइट :-  डेंड्रॉन से अनेक पतली पतली रेखाएं निकली होती है इसे डेन्ड्राइट कहते हैं | 

एक्सॉन :-  साइटन की एक भुजा लंबे प्रवर्ध के रूप में निकली रहती है जिसे तंत्रिकाक्ष या एक्सॉन कहते हैं | 

सिनेप्स :-  दो तंत्रिका ऊतकों के डेन्ड्राइट्स जिस स्थान पर आपस में मिलते हैं सिनेप्स कहलाता है | 

माइलिन शीथ :- एक्सॉन के दोनों  ओर दोहरी झिल्ली से घिरी हुई कोशिकाओं की एक परत होती है , जिसे माइलिन शीथ कहते हैं | इन कोशिकाओं के संपर्क बिंदु को रैन वेयर नोड कहते है | 

तंत्रिका कोशिका के प्रकार 

तंत्रिका कोशिका मुख्यतः तीन प्रकार  हैं –

संवेदी या अभिवाही तंत्रिका कोशिका :- यह तंत्रिका कोशिका संवेदी अंगों को मस्तिष्क और मेरुरज्जु से जोड़ने का कार्य करता है | 

प्रेरक या अपवाही तंत्रिका कोशिका :- यह तंत्रिका कोशिका मस्तिष्क या मेरुरज्जु से प्राप्त आवेगो को पेशीय और ग्रंथि ऊतकों तक ले जाता है |

संयोजक तंत्रिका कोशिका :- यह तंत्रिका कोशिका मस्तिष्क और मेरुरज्जु में पायी जाती है | जो संवेदी तंत्रिका कोशिका और प्रेरक तंत्रिका कोशिका के बीच एक दूसरे को जोड़ने का कार्य करता है | 

निष्कर्ष (Conclusion)

इस पोस्ट में हमने आपको Class 9 Biology Chapter 2 Notes in Hindi का लगभग सभी पॉइंट्स को बता दिया है | हमें आशा है कि आपको हमारी यह नोट्स पसंद आयी होगी | अगर आपको हमारी पोस्ट पसंद आती है तो आप कमेंट बॉक्स में एक बार जरूर कमेंट करे और अपने दोस्तों में भी शेयर करे | 

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